✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल / छतरपुर।
जब जनप्रतिनिधि जनता के दर्द से मुंह मोड़ लें और राजनीति संवेदनाओं की जगह सिर्फ आंकड़ों का खेल बन जाए, तब लोकतंत्र की आत्मा पर सवाल खड़े होना तय है। छतरपुर–पन्ना सीमा पर केन नदी किनारे 12 दिनों तक चला पंचतत्व सत्याग्रह इसी कड़वी सच्चाई का आईना बनकर सामने आया है।
डोढ़न गांव में एक दिल दहला देने वाला दृश्य देखने को मिला—जहां विस्थापित आदिवासी परिवार अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ सांकेतिक चिता और फांसी जैसे प्रतीकों के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहे। लेकिन इस पूरे संघर्ष के दौरान क्षेत्र के जनप्रतिनिधि मूकदर्शक बने रहे।
जनता संकट में, नेता लापता—सवालों के घेरे में सियासत
केन–बेतवा परियोजना, जो हजारों लोगों के जीवन को प्रभावित कर रही है, उस पर क्षेत्र के बड़े राजनीतिक चेहरों की चुप्पी ने लोगों के आक्रोश को और बढ़ा दिया है।
👉 टीकमगढ़ सांसद व केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार खटीक
👉 खजुराहो सांसद वीडी शर्मा
👉 बिजावर विधायक राजेश शुक्ला
👉 पन्ना विधायक बृजेंद्र प्रताप सिंह
इन सभी की गैरमौजूदगी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है—
❓ क्या सत्ता में पहुंचते ही जनता सिर्फ आंकड़ों में सिमट जाती है?
❓ क्या “जल, जंगल और जमीन” के नारे सिर्फ चुनावी मंचों तक ही सीमित हैं?
विपक्ष भी इस मुद्दे पर प्रभावी भूमिका निभाने में विफल रहा। केवल औपचारिक बयानबाजी तक सीमित रहकर उसने भी जमीन पर अपनी जिम्मेदारी से दूरी बनाए रखी।
जब सियासत सोई, तब प्रशासन जागा
राजनीतिक चुप्पी के बीच जिला प्रशासन ने आगे बढ़कर हालात संभालने की कोशिश की। कलेक्टर पार्थ जैसवाल के निर्देशन में अपर कलेक्टर नमः शिवाय अरजरिया के नेतृत्व में टीम मौके पर पहुंची।
करीब 5 घंटे चली मैराथन वार्ता के बाद एक ठोस समाधान का रोडमैप तैयार किया गया, जिससे आंदोलनकारियों के बीच उम्मीद जगी। प्रशासन की इस सक्रियता ने यह साबित किया कि संवेदनशीलता अब भी व्यवस्था में जिंदा है—बस इरादे चाहिए।
केन नदी बनी साक्षी, आंदोलनकारियों की खुली चेतावनी
आंदोलन के सूत्रधार अमित भटनागर और हजारों आदिवासियों ने प्रशासन के प्रयासों की सराहना की, लेकिन साथ ही जनप्रतिनिधियों को सीधी चेतावनी भी दी—यदि 10 दिनों के भीतर आश्वासन जमीन पर नहीं उतरा, तो आंदोलन का अगला चरण ऐसा होगा, जो छतरपुर से लेकर भोपाल और दिल्ली तक सियासत की नींद उड़ा देगा।”
यह सिर्फ विस्थापन नहीं, विश्वास का संघर्ष है
केन नदी के तट पर उठी यह आवाज अब सिर्फ जमीन या मुआवजे की लड़ाई नहीं रही—यह लोकतंत्र में विश्वास बचाने की जंग बन चुकी है।अगर जनप्रतिनिधि अब भी खामोश रहे, तो इतिहास उनकी इस चुप्पी को सबसे बड़ा अपराध दर्ज करेगा।










